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Tuesday, 19 September 2017

घर में शंख रखने और बजाने के फायदे जानिए

हमारे देश में मंदिरो में पूजा-पाठ के दौरान शंख बजाना काफी पुराने समय से चलता आ रहा है. देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियम‍ित रूप से बजाकर मंदिरो में पूजा करे है. ऐसे में यह जानना बड़ा दिलचस्ब हो जाता हे कि शंख केवल पूजा-अर्चना में ही उपयोगी है या इसका सीधे तौर पर कुछ लाभ भी है.

तो चलिए जानते हे घर में शंख रखने और इसको बजाने के फायदे..

1. ऐसा कहा जाता हे की जिस घर में शंख पाया जाता है, वहां माँ लक्ष्मी विराजमान रहती है.

2. शंख को इसलिए भी सही माना गया है, क्योंकि लक्ष्मी माँ और विष्णु ईश्वर, अपने हाथों में इसे रखते हैं.

3. पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण सुध हो जाता है. जहां तक इसकी ध्वनि जाती है.

4. शंख के जल से श‍िव, लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं
5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छ‍िड़कने से वातावरण शुद्ध होता है.

6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है.

7. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है.

8. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है. 

"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई" आखिर क्यों बनाई भगवान् ने दुनिया?

सारि दुनिया के लोग जब कभी अकेले में अपने मन या आत्मा से बातें करते है तो उनके भीतर ये सवाल उठता होगा की जब सबको एक दिन मरना ही है, तो फिर ऊपर वाले ने दुनिया बनाई ही क्यों है? इससे अच्छा तो वो पैदा ही न हो, अगर आपके भी मन में ये सवाल पैदा हुआ है तो आज जाने उसका संभव प्रयास में जवाब.

भारतीय पौराणिक इतिहास दुनिया में सबसे पुराने समय के होने का दावा करता है जो की कमोबेश सही भी है, तो वो क्या कहता है इस सवाल के बारे में? इसके अनुसार एक समय था जब धरती पर केवल जल था और सिर्फ त्रिदेवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) का ही अस्तित्व था जिनका न कोई आदि ही है और न ही अंत.तब एक दिन भगवान् विष्णु शेष शय्या पे सोये हुए थे तब उनकी कान की किट्टी(कचरा) से दो भयंकर असुर पैदा हुए जिनका नाम मधु और कैटभ था. अपने प्रकट होते ही भगवान की नाभि से निकले कमल में बैठे ब्रह्मा जी की और बढ़े, ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की पलकों वक्ष और बाँहो में समाहित योगनिंद्र का पहली बात ध्यान किया.

उनके प्रकट होते ही भगवान विष्णु की निंद्रा खुल गई और उन्होंने ब्रह्मा जी को बचाने के लिए उनसे युद्ध आरम्भ कर दिया, लेकिन 5000 साल तक उनसे द्वन्द करने पर भी वो उन्हें पराजित न कर सके. लेकिन ब्रह्मा जी के कहने पर योगमाया ने उनकी बुद्धि फेरी और उन दो दानवो मधु और कैटभ ने विष्णु के युद्ध से खुश होके वरदान मांगने बोला.
उन्होंने ये शर्त रखी जन्हा धरती जल में न डूबी हो वंही हमारी मृत्यु हो इतना कहना था की भगवान विष्णु ने दोनों का सर अपनी जंघा पे रखा और सुदर्शन से काट दिए. ये दोनों दानव कुछ और नहीं बल्कि भगवान् के मन के विकार थे जिनकी शक्ति देख वो भी चिंता में आ गए.

सम्भवतः इस कारण ही उन्होंने ऐसी घटना की पुनरावृति रोकने के लिए ब्रह्मा जी को श्रिष्टि की रचना आरम्भ करने के लिए कहा था. इस हेतु भगवान् ने अपने ही असंख्यों अंश क्र लिए जिन्हे हम आत्मा कहते है, इस हिसाब से हम भगवान् का ही अंश है और भगवान् ने हमें अपने मन के विकारों को कम करने के लिए धरती पर भेज है.भगवान् अपनी तरह से हर प्रयास करते है की हम इसी की चेस्टा करें लेकिन भगवान् ने ही जब अपने शारीर के अंश किये और पहली दफा औरत और मर्द बनाए तो वो तुरंत भगवान में फिर समाहित हो गए. तब योगमाया की सहायता से उन अंशों को मोहमाया में डाला गया और दोनों के मिलन से श्रष्टि चक्र बढ़ा.

अब ये हम पे निर्भर करता है की हम इस संसार चक्र में दुःख भोगना चाहते है ये परमात्मा में विलीन होके अमर होना, क्योंकि ऐसा करने पर न हमें मृत्यु का भय ही रहेगा और न ही प्रलय में हम विचलित होंगे.

इसलिए जरुरी हे सिर को ढकाना पूजा के समय जानिये क्यों ?

कहा जाता हे की इंसान का सबसे नाजुक और सेंसिटिव अंग मनुष्य का सिर होता है। इसी लिए ये अक्सर देखा जा सकता हे की किसी भी धर्म से जुडी स्त्रियां पूजा पाठ करते समय अपने सिर पे दुपट्टा या साड़ी के पल्लू को हमेशा डाले रखती हैं। बड़ो के सामने सिर पे दुपट्टा या साड़ी के पल्लू को ढंककर रखना सम्मान सूचक भी माना जाता है।

जानिए वैज्ञानिक कारण क्या है 

ब्रह्मरंध्र सिर के बीचों-बीच स्थित होता है। मौसम का मामूली से परिवर्तन के दुष्प्रभाव ब्रह्मरंध्र के भाग से शरीर के अन्य अंगों में आतें हैं। इसके अलावा आकाशीय विद्युतीय तरंगे खुले सिर वाले व्यक्तियों के अंदर घुस कर गुस्सा, दिमागी परेसानी, नज़रे कमजोर होना जैसे कई बीमारियो पैदा करती है। सिर के बालों में रोग फैलाने वाले कीटाणु आसानी से प्रवेश कर जाते हैं, क्योंकि बालों में कुछ ऐसा होता हे जिससे वो आसनी से उस जगह को नही छोड़ते । रोग फैलाने वाले यह कीटाणु बालों से शरीर के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। जिससे व्यक्ति रोगी को रोगी बनाते हैं। इसी कारण सिर और बालों को जहां तक हो सके सिर और बालों को ढककर रखना हमारी परंपरा में शामिल है। साफ , पगड़ी और अन्य साधनों से सिर ढंकने पर कान भी ढंक जाते हैं। जिससे ठंडी और गर्म हवा कान के द्वारा शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती। कई रोगों का इससे बचाव हो जाता है।

सिर ढंकने से आज का जो सबसे गंभीर बीमारी है गनजा हो जाना, बालो का टूटना और खोरा जैसे रोगो से आसानी से बचा जा सकता है। आज भी हिंदू धर्म में परिवार में किसी की मृत्यु पर उसके संबंधियों का मुंडन किया जाता है। ताकि मृतक शरीर से निकलने वाले रोगाणु जो उनके बालों में चिपके रहते हैं। वह नष्ट हो जाए। स्त्रियां बालों को पल्लू से ढंके रहती है। इसलिए वह रोगाणु से बच पाती है। नवजात शिशु का भी पहले ही वर्ष में इसलिए मुंडन किया जाता है ताकि गर्भ के अंदर की जो गंदगी उसके बालों में चिपकी है वह निकल जाए। मुंडन की यह प्रक्रिया अलग-अलग धर्मों में किसी न किसी रूप में है।